VIDEO: संघर्षों से भरी है सेमीफाइनल में पहुंची भारतीय महिला हॉकी टीम के खिलाड़ियों की कहानी

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VIDEO: संघर्षों से भरी है सेमीफाइनल में पहुंची भारतीय महिला हॉकी टीम के खिलाड़ियों की कहानी

नई दिल्ली। आज लोगों को लड़कियों की हॉकी पर बनी फिल्म चक दे इंडिया की याद आ गई। आज हमारी वीमैन हॉकी टीम ने जो कारनामा किया है, उसकी स्टोरी शाहरूख खान की फिल्म चक दे इंडिया से काफी मिलती जुलती हैं लेकिन वो एक कहानी थी, उसमें जो हुआ वो एक्टिंग थी लेकिन आज जो हमने देखा वो असलियत थी। उसकी स्क्रिप्ट किसी ने नहीं लिखी थी लेकिन वो मुकाबला उस टीम में खेलने वाली लड़कियों की कहानी, उनकी जिंदगी की सच्चाई और चक दे इंडिया की कैरेक्टर की कहानी काफी मिलती जुलती है। 

चक दे इंडिया फिल्म में कोच कबीर खान की टीम ऑस्ट्रेलिया में वर्ल्ड कप खेलने जाती है। शुरुआती मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया से बुरी तरह हारती है और फिर इसके बाद ऐसा कमबैक करती है कि फाइनल अपने नाम कर लेती है। टोक्यो ओलंपिक में हमारी टीम अपने पहले तीन मैचों में बुरी तरह हारी। पहला मुकाबला नीदरलैंड्स से था, ये मैच हम 5 गोल से हारे। इसके बाद जर्मनी और फिर ब्रिटेन ने भी भारतीय टीम को हरा दिया। जब उम्मीदें टूट रही थी तो हमारी टीम ने बाउंस बैक किया। कोच शॉर्ड मारिने ने टीम का हौसला बढ़ाया। कोच ने टीम को इंस्पायर करने के लिए एक फिल्म भी दिखाई। मोटिवेट करने के लिए एक लंबी स्पीच दी और फिर टीम ने अपना रंग बदला, हिम्मत दिखाई और कहानी बदल दी। पहले आयरलैंड को हराया फिर साउथ अफ्रीका को धूल चटाई। क्वार्टरफाइनल में पहुंचे। मुकाबला ऑस्ट्रेलिया की टीम से था, सबको लगा कि तीन बार की वर्ल्ड चैंपियन के सामने भारतीय टीम कैसे टिक पाएगी, लेकिन आज देश की बेटियों ने ऐसा खेल दिया, शुरुआती अटैक के बाद तीन क्वार्टर्स में ऐसा डिफेंड किया कि ऑस्ट्रेलिया को हार का सामना करना पड़ा। मैच खत्म होने के बाद दोनों टीम के खिलाड़ियों की आंखों में आंसू थे।ऑस्ट्रेलियंस हार पर रो रहे थे और भारत की बेटियों की आंखों में खुशी के आंसू थे।

इकलौता गोल करने वाली गुरजीत कौर के पिता ने मोटरसाइकिल बेंच दिलायी थी हॉकी किट

जिन बेटियों की की वजह से देश को गर्व का मौका मिला, आज उन बेटियों की बात करेंगे। सबसे पहले मैं आपको आज के मैच में इकलौता गोल करने वाली गुरजीत कौर की कहानी सुनाता हूं। आज गुरजीत कौर ने मैच के दूसरे क्वार्टर के 8वें मिनट में ड्रैग फ्लिक से गोल मारकर ऑस्ट्रेलिया को बैकफुट पर ला दिया था। गुरजीत टीम में डिफेंडर की पोजिशन पर खेलती हैं, यानी उनका काम है कि विरोधी टीम के खिलाड़ी को गोल पोस्ट तक पहुंचने से रोकना, उन्हें टैकल करना और फिर बॉल को दोबारा अपनी टीम के खिलाडियों को पास देना, यानी कनेक्टिविटी बेहतर होनी चाहिए लेकिन आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि हॉकी स्टिक से इतने बड़े मैच में गोल दागने वाली और इतिहास रचने वाली गुरजीत के गावं में आज भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कनेक्टिविटी नहीं है। उनके गांव तक पंजाब रोडवेज की बस नहीं पहुंचती। 25 साल की गुरजीत पंजाब में अमृतसर के अजनाला इलाके के मियादी कला गांव की रहने वाली हैं। परिवार में किसी ने हॉकी स्टिक नहीं पकड़ी थी, किसान परिवार सिर्फ खेतों तक का रास्ता जानता था लेकिन गुरजीत की जिद थी कि उन्हें तो हॉकी में नाम रोशन करना है, इसलिए पिता को झुकना पड़ा। तरनतारन के बोर्डिंग स्कूल में एडमिशन करवाया लेकिन बेटी को हॉकी की प्रैक्टिस करवाना इतना आसान नहीं था, इसलिए घरवालों ने बेटी की हॉकी किट खरीदने और उसकी कोचिंग के लिए घर की मोटरसाइकिल तक बेच दी। इसके बाद गुरजीत ने भी हॉकी की फील्ड पर अपनी पहचान बनाना शुरू कर दिया। गुरजीत कौर को देश के लिए खेलने का पहला मौका 2014 में सीनियर नेशनल कैंप में मिला था। हालांकि, वो टीम में अपनी जगह पक्की नहीं कर पाई थीं लेकिन तीन साल बाद 2017 में वो इंडियन टीम का हिस्सा बनीं। और तब से टीम के साथ बनी हुई हैं। आज गुरजीत के घर में जश्न है किन परिवार की आंखों में आपको गुरजीत की मेहनत दिख जाएगी। लगन, तपस्या और त्याग नजर आएगा।

भारतीय महिला हॉकी टीम ने सेमीफाइनल में बनाई जगह

टोक्यो ओलंपिक 2020 के 11वें दिन भारत की महिला हॉकी टीम ने शानदार प्रदर्शन कर सेमीफाइनल में अपनी जगह बना ली है। सोमवार को हुए ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच महिला हॉकी के क्वार्टर फाइनल मैच में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 1-0 से हरा दिया। ऐसा पहली बार हुआ है जब महिला हॉकी टीम ने ओलंपिक में ऑस्ट्रेलिया को हरा कर सेमीफाइनल में एंट्री की है। इस मैच में एक किसान परिवार में जन्मी ड्रैग फ्लिकर गुरजीत कौर के गोल ने टोक्यो ओलंपिक में इतिहास रच दिया। जिसके प्रदर्शन का पूरा भारत दीवाना हो गया है। हर कोई जानना चाहता है कि वह कौन है, उन्होंने हॉकी की शुरुआत कब से और कैसे की। 

जानिए गुरजीत कौर के बारे में 

अमृतसर की मियादी कला गांव की रहने वाली 25 साल की गुरजीत किसान परिवार से है। जिनका हॉकी से कोई संबंध नहीं था। उनके पिता सतनाम सिंह बेटी की पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर थे। गुरजीत और उनकी बहन प्रदीप ने शुरुआती शिक्षा गांव के निजी स्कूल से ली और फिर बाद में उनका दाखिला तरनतारन के कैरों गांव में स्थित बोर्डिंग स्कूल में करा दिया गया। गुरजीत का हॉकी का सपना वहीं से शुरू हुआ। बोर्डिंग स्कूल में लड़कियों को हॉकी खेलता देख गुरजीत बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने इसे अपनी जिंदगी बनाने का फैसला कर लिया। गुरजीत और उनकी बहन ने खेल में जल्द ही महारत हासिल की जिसके कारण उन्हें मुफ्त शिक्षा प्राप्त हुई। इसके बाद गुरजीत कौर ने अपना ग्रेजुएशन जालंधर के लायलपुर खालसा कॉलेज से पूरा किया। इसके तुरंत बाद ही उन्होंने बिना देर किए राष्ट्रीय स्तर पर खेलना शुरू किर दिया था।

गुरजीत कौर को देश के लिए खेलने का पहला मौका 2014 में सीनियर नेशलन कैंप में मिला था। हालांकि वह टीम में अपनी जगह पक्की नहीं कर पाई थी। गुरजीत एक मात्र महिला खिलाड़ी है जिन्होंने 2017 में भारतीय महिला हॉकी टीम की स्थायी सदस्य बनी। उन्होंने मार्च 2017 में कनाडा में टेस्ट सीरीज भी खेली ही। उन्होंने अप्रैल 2017 में हॉकी वर्ल्ड लीग राउंट 2 और जुलाई 2017 में हॉकी वर्ल्ड लीग सेमीफाइनल में प्रतिनिधित्व किया था। टोक्यो ओलंपिक में सोमवार को हुए मैच के 22वें मिनट में गुरजीत ने पेनल्टी कार्नर पर एक महत्वपूर्ण गोल किया था। इसके बाद भारतीय टीम ने अपनी पूरी ताकत गोल बचाने में लगा दी जिसमें वह सफल रही। गोलकीपर सविता ने भी बेहतरीन प्रदर्शन कर पूरी टीम ने बहुत अच्छा साथ दिया। आखिरी बार भारतीय महिला टीम 1980 के ओलंपिक में अंतिम 4 में पहुंची थी। 1980 के ओलंपिक राउंड रॉबिन के आधार पर खेला गया था जिसमें महिला टीम आखिरी 4 में पहुंची थी।

जानिए सलीमा टेटे के बारे में

गुरजीत तो पंजाब के गांव की हैं। गुरजीत के पिता के पास पक्का घर है लेकिन हमारी टीम में ऐसी कई बेटियां हैं जो कच्चे घर में रहकर बांस की लकड़ी को हॉकी बनाकर खेलीं और ओलंपिक में पहुंच गईं। आप आप झोपड़ीनुमा घर में रहने वाली सलीमा टेटे से मिलिए जो इस वक्त टोक्यो में है। भरतीय महिला हॉकी टीम की मेंबर हैं। सिमडेगा की रहने वाली सलीमा टेटे इस टीम में डिफेंडर हैं। खपरैल का कच्चा घर, घर के सामने कच्चा रास्ता, इसी घर में सलीमा टेटे रहती हैं। टोक्यो से लौटेंगी तो इसी घर में आएंगी। घर देखकर ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सलीमा के घर की आर्थिक हालत कैसी होगी। परिवार में पांच बहनें और एक भाई है। घर की हालत ऐसी नहीं थी कि बेटी को स्पोर्ट्स में भेज सकें, लेकिन सलीमा टेटे के परिवार ने बचपन में ही उनका टैलेंट पहचान लिया। उनकी बड़ी बहन और भाई काम करने बाहर चले गए। सलीमा के बहन अनीमा ने बैंगलोर में मेड का काम किया, बर्तन धोए, घर-घर काम किया लेकिन छोटी बहन के खेल को बढ़ावा दिया। सलीमा जब हॉकी की वर्ल्ड चैंपियनशिप खेलने गई तो उसके पास ट्रॉली बैग नहीं था। कुछ परिचितों ने किसी से पुराना बैग लेकर दिया, पॉकेट मनी नहीं था तो फेसबुक पर मुहिम चलाकर पॉकेट मनी का इंतजाम किया गया और उस बार भी वो जीत कर लौटी थी। सलीमा के पिता सुलक्षण टेटे भी हॉकी के अच्छे खिलाड़ी थे लेकिन हालात के कारण वो अपने सपने पूरे नहीं कर पाए। इसलिए बेटी को आगे बढ़ाने में पसीना बहाया और बेटी ने ना सिर्फ पिता के अरमान पूरे किए बल्कि पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। अब सलीमा के पिता बेटी के गोल्ड जीतने का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर टीम को गोल्ड मेडल मिलता है तो उनके गांव और शहर ही नहीं बल्कि पूरे झारखंड की लड़कियों का हॉकी में इंट्रेस्ट बढ़ेगा। 

सलीमा चूंकि नेशनल लेवल पर कई टूर्नामेंट खेल चुकी है, इसलिए उसे सरकारी नौकरी मिल गई है। चूंकि खेल से नौकरी मिल सकती है इसलिए गरीब परिवारों में खेलों के प्रति रूझान बढ़ा है। सलीमा के छोटी बहन भी हॉकी खेलती है लेकिन वो सलीमा की तरह आगे नहीं बढ़ सकी, क्योंकि परिवार के पास सिर्फ एक बेटी को हॉकी देने की हैसियत थी लेकिन छोटी बहन को इसका मलाल नहीं है। महिमा का कहना है कि बहन ओलंपिक में गोल्ड जीते इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है। 

सलीमा टेटे भले ही चर्चा में अब आई हों लेकिन इंडियन टीम के साथ उनका शानदार प्रदर्शन काफी साल से जारी है। 2016 में वो पहली बार इंडियन जूनियर टीम में चुनी गई, उसी साल सलीमा को अंडर-18 एशिया कप के लिए वाइस कैप्टन बनाया गया। 2018 में अर्जेंटीन में हुए यूथ ओलम्पिक्स में सलीमा टेटे कैप्टन थी और उनकी लीडरशिप में टीम ने सिल्वर मेडल जीता था। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे मुलाकात भी की थी। डिफेंडर होने के बावजूद यूथ ओलम्पिक में सलीमा टेटे ने 4 गोल भी किए थे। प्रधानमंत्री ने तब उन्हें ब्राइट फ्यूचर की शुभकामनाएं दी थी और अब देश सलीमा टेटे से गोल्ड मेडल मांग रहा है। 

जब निक्की प्रधान की मां को रांची के स्टेडियम में नहीं जाने दिया गया…

अब आपको झारखंड़ के खूंटी जिले की रहने वाली निक्की प्रधान से मिलवाते हैं। निक्की के पिता पुलिस में सिपाही थे, रिटायर हो चुके हैं लेकिन उन्होंने बेटी के सपने को पूरा करने में खूब मेहनत की। बेटी को हॉकी खेलने का शौक था तो हॉकी दिलवाई लेकिन वक्त नहीं दे पाए क्योंकि पुलिस की नौकरी में परिवार के लिए वक्त नहीं था इसलिए मां ही बेटी के साथ जाती थी। कोच का सपोर्ट मिल गया तो थोड़ी आसानी हो गई। निक्की हॉकी टीम में डिफेंडर हैं। उनकी मां ने बताया कि वो बेटी के साथ रांची गई थी, बेटी स्टेट लेवल पर रांची के स्टेडियम में मैच खेल रही थी लेकिन पुलिस वालों ने उसकी मां को स्टेडियम में नहीं घुसने दिया। मां ने बार-बार बताया कि उनकी बेटी मैच खेल रही है लेकिन किसी ने उसकी बात पर यकीन नहीं किया। इसलिए आज जब बेटी ओलंपिक मुकाबले में जीत गई तो मां की आंखों में आंसू आ गए। 

झारखंड के नक्सल प्रभावित पिछड़े इलाके खूंटी जिले की एकमात्र डिफेंडर निक्की प्रधान के माता पिता ने खुशी जाहिर की है। अपने कच्चे मकान के सामने बैठे सेवानिवृत्त झारखंड पुलिस के सिपाही निक्की के पिता सोमा प्रधान ने कहा कि बेटी जरूर गोल्ड लेकर आएगी, जबकि निक्की की माता जीतन देवी आज टीवी स्क्रीन पर पूरा मैच देख भावुक हो गई। कह रही थीं कि मेरी बेटी खेलते समय जब मैदान पर गिर जाती तो काफी तकलीफ होती है लेकिन क्या करें खेल में गिरना संभलना तो लगा है लेकिन मेरी बेटी निक्की गोल्ड लेकर जरूर आएगी। इधर निक्की प्रधान के कोच दशरथ महतो ने भी पूरे टीम को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में निक्की को ट्रेनिंग दिया गया। निक्की शुरुआत से ही मेहनती थी जिसका नतीजा है कि आज निक्की को पूरा देश जानता है और निक्की देश के लिए गोल्ड लेकर तो जरूर आएगी।

निक्की को तराशने में उनके कोच दशरथ महतो को काफी संघर्ष करना पड़ा, नक्सल प्रभावित पिछड़े इलाके खूंटी मैं जब कोच ने हॉकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया तो लोग हंसते थे। लेकिन क्षेत्र से कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय खिलाड़ी निकले जो आज विभिन्न नौकरियों में है। उनका कहना है सरकार का अगर सहयोग मिले तो क्षेत्र के बच्चे खेल में और आगे बढ़ सकते हैं। निक्की प्रधान की मां ने मां को उम्मीद है कि उनकी बेटी टोक्यो से गोल्ड मेडल लेकर आएगी।

झारखंड की बेटियों के हाथ में हॉकी स्टिक आई कैसे और बेटियों को हॉकी खिलाने का असली मकसद क्या है। इसका अंदाजा निक्की प्रधान के कोच की बातें सुनकर लगेगा। निक्की प्रधान के कोच हैं दशरथ महतो ने कहा कि ये बहुत गरीब घर की लड़कियां हैं, उनके पास न रहने को पक्का घर है न खाने को अच्छा खाना। शुरुआत में तो बांस की लकड़ियों से हॉकी और ब़ॉल बनाकर खेलते थे। कोच ने बताया कि ये लड़कियां खेलों में इसलिए जाती है, हॉकी स्टिक इसलिए पकड़ती हैं ताकि उन्हें सरकारी नौकरी मिल जाए, वो परिवार की मदद कर सकें। दशरथ महतो ने कहा कि इस बार तो बेटियों ने कमाल कर दिया। ओलंपिक में ऐसी दहाड़ मारी कि झारखंड की कई लड़कियों के लिए हॉकी खेलने का रास्ता खोल दिया। 

झारखंड के साथ-साथ हरियाणा वो राज्य है जहां के बच्चे खेलों में जबरदस्त परफॉर्म कर रहे हैं। हमारी जो हॉकी टीम ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुंची है उसमें 9 खिलाड़ी हरियाणा की हैं। ये तीनों लड़कियां हरियाणा के किसी बड़े शहर की नहीं हैं, छोटी जगहों से हैं लेकिन इनकी पारिवारिक स्थिति झारखंड की लड़कियों से बेहतर है। इसकी वजह है हरियाणा में खेलों का बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर। इसलिए हरियाणा की लड़कियां भी खेलों में देश का नाम रौशन कर रही हैं। आज ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हमारी टीम ने जिस तरह मजबूती से डिफेंड किया तो उसे देखकर लगता है कि अर्जेंटीना के खिलाफ अगली चुनौती के लिए भी हमारी टीम तैयार है। आज मैं खासतौर पर सविता पुनिया की बात जरूर करना चाहूंगा। आज पूरे मैच में ऑस्ट्रेलिया को सात पेनाल्टी कॉर्नर मिले। ऑस्ट्रेलिया वो टीम थी जिसने अभी तक के अपने मुकाबलों में सिर्फ एक गोल की कंसीड किया था जबकि विरोधियों के गोल पोस्ट में 13 बार, बॉल को पहुंचाया था जबकि हमारी टीम ने तो टूर्नामेंट में 14 गोल कंसीड किए थे। यानी 14 बार विरोधी टीम ने हमारे खिलाफ गोल दागा लेकिन आज के मैच में गोल कीपर सविता पुनिया तो दीवार बनकर जम गई। सविता ने 60 मिनट के खेल के दौरान ऑस्ट्रेलिया के सात पेनाल्टी कॉर्नर को कामयाबी से डिफेंड किया। इसके अलावा दो फील्ड गोल भी रोके, जिस वक्त आखिरी के दो क्वार्टर्स में ऑस्ट्रेलियन टीम डॉमिनेट होकर खेल रही थी। उस दौरान हमारी टीम का डिफेंस काफी सॉलिड था, कहीं भी कोई कन्फ्यूजन नहीं थी। कोई भी खिलाड़ी ज्यादा देर तक बॉल अपने पास नहीं रोक रहा था, मजबूत पास और स्ट्रॉन्ग गोलकीपिंग की बदौलत हमारी वीमेंस हॉकी टीम ओलंपिक मेडल के और करीब पहुंच गई। आज सविता के घर भी जश्न का माहौल है। सविता..हरियाणा के सिरसा में जोधका गांव की रहने वाली हैं। 

उधार की हॉकी लेकर खेलना शुरू किया था कप्तान रानी रामपाल ने 

आज अगर हम रानी रामपाल और उनके स्ट्रगल और कामयाबी की बात नहीं करेंगे तो ये कहानी अधूरी रह जाएगी। रानी रामपाल भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान, जुझारू प्लेयर, ऐसा शायद ही कोई अवॉर्ड हो जो रानी के घरों की दीवारों पर ना दिखाई दे। पद्मश्री से सम्मानित हैं, राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्डी हैं। पिछले साल वो वर्ल्ड गेम्स एथलीट ऑफ द ईयर का खिताब पाने वाली पहली हॉकी खिलाड़ी बनीं लेकिन हरियाणा के शाहबाद की रहने वाली रानी रामपाल का हॉकी खेलना और फिर टीम इंडिया को लीड करना। ये बहुत बड़ी बात है। रानी रामपाल के पिता रिक्शा चलाते थे, भाई कारपेंटर का काम करता था, घर में दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना ही अपने आप में बड़ी बात थी। पिता को अस्सी रुपए दिहाड़ी मिलती थी। मां दूसरों के घरों में मेड का काम करती थी। कई दिन तो ऐसे थे, जब सिर्फ दो वक्त का खाना ही नसीब होता था। अगर बारिश आ जाए तो फिर पूरा घर पानी में डूब जाता था। ऐसे में जब बेटी ने कहा कि हॉकी खेलना है तो फिर घरवालों का विरोध स्वाभाविक था। माता-पिता ने समझाया कि ऐसी हालत नहीं है कि हॉकी खिला सकें, ट्रेनिंग करवा सकें, अच्छी डाइट का इंतजाम कर सकें, ये मुमकिन नहीं है। सोचिए घर की हालत ऐसी थी कि एक हॉकी स्टिक तो दूर की बात एक अलॉर्म क्लॉक तक नहीं थी लेकिन जब रानी को पता चला कि उनके स्कूल में राइटिंग कॉम्पिटीशन में फर्स्ट् प्राइज के तौर पर अलार्म क्लॉक मिलनी थी तो उन्होंने इसके लिए खूब मेहनत की और फर्स्ट प्राइज जीतकर अलार्म क्लॉक घर लाईं। एक इंटरव्यू में ये सारी बातें खुद रानी रामपाल और उनके परिवार ने बताईं। घरवालों का कहना था कि जब रानी ने हॉकी खेलने की जिद की तो परिवार की तरफ से, बिरादरी की तरफ से, रिश्तेदारों की तरफ से काफी ऑब्जेक्शन हुआ। लोग कहने लगे कि घर की लड़की शॉर्ट्स पहनकर हॉकी लेकर कैसे बाहर निकलेगी। मैदान में जाना तो काफी दूर की बात है लेकिन रानी को इन सारी बातों की परवाह नहीं थी। उन्होंने पहले टूटी हुई हॉकी से खेलना शुरु किया। इसके बाद सीनियर खिलाड़ियों से उनकी पुरानी हॉकी उधार ले ली, उधार की हॉकी लेकर खेलना शुरू किया। आज के जमाने में ओलंपिक खिलाड़ियों की डाइट का पूरा हिसाब किताब रहता है। कितने कार्ब्स, कितने फैट, कितनी कैलोरीज चाहिए, पूरा चार्ट मेंटेन करना पड़ता है। डाइट प्लान को फॉलो करना पड़ता है, लेकिन रानी रामपाल तो हॉकी के मैदान में, जेब में चने रखकर प्रैक्टिस करती थीं। सोचकर देखिए रानी का सफर कैसा रहा होगा। उन्होंने एक इंटरव्यू में ये भी बताया था कि जब ट्रेनिंग के लिए एकेडमी जाती थीं तो उस वक्त हर खिलाड़ी से कहा जाता था कि 500 मिलीलीटर दूध पीना जरूरी है लेकिन परिवार की हालत ऐसी नहीं थी कि रोज आधा लीटर दूध बेटी को दे सकें इसलिए रानी रामपाल 200 मिलीलीटर दूध में पानी डालकर उसे 500 मिलीलीटर बनाती थी और फिर उसे पीकर हॉकी के मैदान में ट्रेनिंग करती थीं। आज इन्हीं सब बातों को उनके पिता रामपाल याद करते हुए इमोशनल हो जाते हैं। रानी रामपाल हॉकी की दुनिया में वो नाम बन चुका है, जिसे अब यंगस्टर्स फॉलो करते है। वो कहते हैं कि अब रानी रामपाल जैसी हॉकी खेलनी है। 

वंदना कटारिया ने पेड़ की टहनी से हॉकी खेलना सीखा

हमारी हॉकी टीम में एक और प्लेयर हैं वंदना कटारिया। वंदना के घर की हालत अब पहले से तो बेहतर है लेकिन बचपन में इस खिलाड़ी के पास हॉकी स्टिक तक नहीं होती थी उसने पेड़ की टहनी से हॉकी खेलना सीखा। वंदना कटारिया हरिद्वार के छोटे से गांव रोशनाबाद की रहने वाली हैं। टीम इंडिया की बेहतरीन फॉर्वर्ड खिलाड़ी वंदना की काबिलियत का अंदाजा आपको उनके क्वालिफाइंग राउंड के प्रदर्शन के बारे में जानकर लगेगा। वंदना ने साउथ अफ्रीका के खिलाफ मैच में तीन गोल दाग दिए। ओलंपिक में हैट्रिक लगाने वाली पहली महिला खिलाड़ी बन गईं लेकिन वंदना का हॉकी खेलने का सफर आसान नही था। वंदना के परिवार में ज्यादातर लोग उनके हॉकी खेलने के खिलाफ थी। मां, भाई-बहन सब ओपोज करते थे लेकिन पिता नाहर सिंह चाहते थे कि बेटी आगे बढ़े, अपने सपनों को पूरा करे, इसलिए पिता का सपोर्ट मिला। बेटी ने भी मेहनत में कोई कमी नहीं छोड़ी। लेकिन मलाल इस बात का है बेटी कि इस सफलता को देखने के पिता इस दुनिया में नहीं हैं। तीन महीने पहले ही वंदना के पिता का अचानक निधन हो गया चूंकि वंदना ओलंपिक की ट्रेनिंग के लिए बेंगलुरू में थी, कैंप में थीं इसलिए वो पिता की मौत पर घर भी नहीं आ सकी लेकिन अब परिवार का कहना है कि वंदना खेल के मैदान पर पिता की आखिरी ख्वाहिश पूरा करने के लिए खेल रही हैं। पिता की ख्वाहिश थी कि बेटी अपनी हॉकी स्टिक से पूरी दुनिया में नाम रौशन करे, अच्छा खेले देश के लिए मेडल जीते

जानिए भारत की दमदार गोलकीप सविता पुनिया के बारे में

हरिद्वार के छोटे से गांव की वंदना कटारिया ने ओलंपिक में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। वंदना ने ऐतिहासिक उपलब्धि से दिवंगत पिता को श्रद्धांजलि दी है। वंदना की इस उपलब्धि पर परिजनों, ग्रामीणों और जिले के खेल अधिकारियों में जश्न का माहौल है। बहादराबाद ब्लॉक क्षेत्र के गांव रोशनाबाद निवासी वंदना कटारिया ने पढ़ाई के साथ हॉकी को अपना कॅरियर बनाने के लिए जी जान से मेहनत की है। वंदना कटारिया का जन्म 15 अप्रैल 1992 में रोशनाबाद में ही हुआ है। वंदना कटारिया ने पहली बार जूनियर अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में 2006 में प्रतिभाग किया। वर्ष 2013 में देश में सबसे अधिक गोल करने में सफल रहीं। जर्मनी में हुए जूनियर महिला विश्वकप में वंदना कटारिया कांस्य पदक विजेता बनीं। वंदना ने हॉकी में फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ओलंपिक में वंदना की हैट्रिक से परिवार बेहद खुश है। उसकी मां सौरण देवी ने कहा कि वंदना ने हैट्रिक लगाकर अपने पिता को श्रद्धांजलि दी है। 2021 मई में पिता नाहर सिंह का आकस्मिक निधन हो गया था। तब गांव नहीं आ पाई थीं। तब वह ओलंपिक के लिए बेंगलुरु में चल रहे कैंप में तैयारी कर रही थीं, उनके हैट्रिक लगाने से गांव में जश्न है। उनकी मां समेत चार भाई और पांच बहनें हैं। सभी भाइयों की शादी हो चुकी है। वंदना और अंजलि की अभी शादी नहीं हुई है। भाई पंकज ने बताया कि उन्हें अपनी बहन पर गर्व है। सदस्यों ने एक दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी मनाई। भारतीय महिला हॉकी टीम की खिलाड़ी वंदना कटारिया ने 31 जुलाई 2021 को टोक्यो में इतिहास रचा। उन्होंने टोक्यो ओलंपिक में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैच में हैट्रिक लगाई। वह ओलंपिक 125 साल के इतिहास में हॉकी में हैट्रिक लगाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बन गई हैं।

ओवरऑल बात करें तो 1984 के बाद किसी भारतीय ने पहली बार ओलंपिक में हैट्रिक लगाई है। इससे पहले आखिरी बार 1984 ओलंपिक में पुरुष हॉकी खिलाड़ी विनीत शर्मा ने हैट्रिक लगाई थी। विनीत ने तब मलेशिया के खिलाफ मुकाबले में यह उपलब्धि हासिल की थी। वह मैच भारत ने 3-1 से जीता था। खेलों के महाकुंभ यानी ओलंपिक में भारतीय हॉकी की ओवरऑल यह 32वीं हैट्रिक है। इन 32 में से 7 हैट्रिक मेजर ध्यानचंद (Major Dhyan Chand) के नाम हैं।  

आज जब हमारी लड़कियों की टीम ने ऑस्ट्रेलिया को हराया, ये जीत कोई बाय चांस नहीं मिली, जिस तरह से हमारी लड़कियों ने हॉकी खेली वो सिर्फ एक जीतने वाली टीम ही खेल सकती थी। ऑस्ट्रेलिया वूमेन 3 बार वर्ल्ड चैंपियन रह चुकी है और हमारी टीम 40 साल से सेमीफाइनल के करीब भी नहीं पहुंची लेकिन आज का मैच देखने के बाद लगा कि हमारी टीम मेंटली और फिजिकली दोनों तरह से ऑस्ट्रेलिया की टीम से मजबूत थी। हमारी लड़कियों ने अटैकिंग हॉकी खेली। ऑस्ट्रेलिया को कोई मौका नहीं दिया, जब गुरजीत कौर ने खेल के 22 वें मिनट में गोल किया तो उसके बाद ऑस्ट्रेलिया के पास करीब 38 मिनट का टाइम था। स्कोर बराबर करने के लिए बहुत लंबा टाइम था लेकिन हमारी टीम ने अपने गोल को जबरदस्त तरीके से डिफेंड किया। ऑस्ट्रेलिया को 7 पेनाल्टी कॉर्नर मिले लेकिन हमारी डिफेंस लाइन ने उन्हें गोल नहीं करने दिया। आज पूरा देश चाह रहा है कि हमारी महिला हॉकी टीम इस बार मेडल लेकर लौटे,आज की जीत ने जो संदेश दिया है वो एक न एक दिन जरूर ऐसी टीम तैयार करने में मदद करेगी, जो वर्ल्ड चैपियन होगी जो गोल्ड जीतेगी।

4 अगस्त को मुकाबला

भारतीय महिला हॉकी टीम का अगला मुकाबला सेमीफाइनल में अर्जेंटीना से होगा। जहां 4 अगस्त को दोनों ही टीमें ओलंपिक में भिड़ेंगी। अगर महिला हॉकी टीम अर्जेंटीना को भी हार का सामना करा पाती है तो वह इतिहास रचने से सिर्फ एक कदम ही दूर होगी। सभी की निगाहें अब 4 अगस्त पर टिकी हैं जब भारतीय महिला हॉकी टीम का सेमीफाइनल में बड़ा और निर्णायक मुकाबला होगा।

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